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चाँद धरती से कितना दूर है (Chaand Dharati Se Kitna Door Hai)

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नमस्कार दोस्तों, आज के इस article मे हम जानेगे के चाँद धरती से कितना दूर है ? जैसा की आप सभी जानते हैं की हमारा ब्रह्माण्ड सौर मंडल ग्रहो, आकाश गंगा और उल्कापिंड आदि से मिलकर बना है। हमारे सौर मंडल मे 8 ग्रह है, और 185 ज्ञात प्राकृतिक उपग्रह है।हर ग्रह के एक या एक से ज्यादा उपग्रह है। चन्द्रमा भी धऱती का एकमात्र प्रकृतिक उपग्रह है।

ब्रह्माण्ड को लेकर मानव के मन मे अजीब और अलग अलग सवाल आते रहते है।तो चलिए, अब आपकोबताते है कि Chaand Dharti Se kitna Door Hai? चाँद पर सबसे पहले कब कौन गया था? चाँद पर पहुंचने में कितना समय लगता है आदि छोटी बड़ी जानकारियों से अवगत करवाते हुए आपको चाँद की सैर पर ले चलते है।तो चलिए शुरू करते है :

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चाँद धरती से कितना दूर है

Chaand Dharati Se Kitna Door Hai

वैज्ञानिको के अनुसार चाँद धरती से लगभग 384,403 km अर्थात 238,857 miles की दुरी पर मौजूद है।जिस प्रकार धरती सूर्य की निरंतर परिक्रमा करती रहती है ठीक उसी प्रकार चाँद हमेशा पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है।वैज्ञनिको द्वारा बताई गयी यह दुरी चन्द्रमा के परिक्रमा के दौरान धरती से उसकी निकटतम और अधिकतम दुरी के मध्य औसत आंकड़ों की गणना पर आधारित है। चाँद का केवल 59% हिस्सा ही धरती से दिखाई देता है।

चाँदएक प्राकृतिक उपग्रह

चंद्रमा  पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक  उपग्रह  और निकटतम विशाल खगोलीय पिंड है। प्रागैतिहासिक काल से ज्ञात, यह  सूर्य के बाद आकाश की सबसे चमकीली वस्तु है । इसे प्रतीक द्वारा निरूपित किया जाता है। अंग्रेजी में इसका नाम, पृथ्वी की तरह, जर्मनिक और पुरानी अंग्रेजी व्युत्पत्ति का है।

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चाँद धरती का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है, जो हर समय धरती की परिक्रमा करता रहता है। चन्द्रमा 27.3 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है।वैज्ञनिको का मानना है की थिया नामक उल्का पृथ्वी से टकराया था। जिसकी वजह से पृथ्वी का कुछ हिस्सा टूट कर अलग हो गया जो चाँद बनाहै।चाँद धरती के आकार का केवल 27% ही है।

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चन्द्रमा ,पृथ्वी और सूर्य की निरंतर बदलती परिस्थियों की वजह से चाँद अमावस्या से पूर्णिमा तक क्रमश: बढ़ता है  और पूर्णिमा से अमावस्या तकक्रमश: घटता रहता है, इसे चंद्रकलाएँ कहते है। चन्द्रमा की 16 कलाएँ होती है।

धरती से चाँद पर पहुंचने मे कितना समय लगता है?

चाँद पर मानव के जाने का इतिहास भी काफी पुराना हो चुका है। धरती से चाँद तक पहुंचने का समय कितना लगेगा यह इस बात पर निर्भर करता है की हम किस विमान से यात्रा कर रहे है ? उसकी गति क्या है?

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धरती से चन्द्रमा पर भेजे गए बिमानो मे से सबसे कम स्पीड वाला विमान ESA स्मार्ट –1 है , जिसने चाँद पर पहुँचने के  लिए 1 year 1 Month एंड 2 weeks का समय ले लिया था।अब तक का सबसे तेज विमान नासा NEW HORIZON है, जो पृथ्वी से चाँद के बिच की दुरी करीब 8 घंटे और 35 मिनट्स मे तय कर लेता है।

आप ये तो जानते ही होंगे की चाँद पर पहला कदम Neel Armstrong ने रखा था और उन्ही के साथ चाँद पर उतरने वाले दूसरे व्यक्ति बज एल्ड्रिन थे ।इसके अलावा आपको ये जानकर हैरानी होगी की उनके कदम के निशान आज भी चाँद पर मौजूद है, और आने वाले लाखो वर्षो तक ये निशान बने रहेंगे, क्योंकि चाँद पर हवा नहीं है जो इन निशानों को मिटासके।अब तक चाँद पर 12 लोग गए है।

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क्या चाँद पर जीवन संभव है?

अगरआपके मन मे भी ये सवाल आता है तो आपको बता दे की, जी हाँ चाँद पर जीवन संभव है।चाँद की सतह खुरदरी है और इसपर अस्थिर व हल्का वायुमंडल उपस्थित है। चाँद की सतह पर बर्फ रूप मे पानी भी मौजूद है। चन्द्रमा पर ऑक्सीजन भी पाई गयी है।

Scientists के एक रिसर्च के अनुसार चाँद की सतह पर अलग अलग जगहों, रात और दिन के बीच मे temperature पर डिफरेंस मे जमीं आसमान का अंतर् पाया जाता है।चाँद का नक्शा बनाने वाले पहले वैज्ञानिक थॉमस हैरियट थे।उन्होंने दूरबीन से चाँद को देखकर चाँद का डायग्राम तैयार किया था।

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चाँद पर भारत की उपलब्धियां

इसरो का चंद्रयान-1 पहला मिशन था।भारत के पहले चंद्रयान ने चाँद तक पहुंचने के लिए 5 दिन लिए थे।हमारे महान साइंटिस्ट और पूर्व प्रेजिडेंट एपीजे अब्दुकल कलाम ने MIP डिवाइस बनाने के बारे मे विचार किया था।उनकी इच्छा थी की इंडियन साइंटिस्ट चाँद के एक पार्ट पर अपने निशान छोडे।

इसरो के साइंटिस्ट ने उनकी इस इच्छा को पूरा किया। 2008 मे MIP डिवाइस को चंद्रयानकी मददसे चाँद पर भेजा गया था।जिस हिस्से पर इस device को उतारा था वैज्ञानिको ने उस हिस्से को जवाहर पॉइंट का नाम दिया है।शोधकर्ताओं ने इस डिवाइस से प्राप्त Data से चाँद पर पानी मिलने और चाँद को जंग लगने के बारे मे पता लगाया है।

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चाँद पर पानी की खोज भारत ने की है।भारतीय अंतरिक्ष अनुसधान संगठन (ISRO)  ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुवात 60 के दशक मे बेहद सिमित सन्साधनो के साथ की थी।भारत ने 22 October 2008 को अपना पहला चंद्रयान भेजा था।यह करीब 10  महीने तक चन्द्रमा के चारो तरफ घूमता रहा।वैज्ञानिको ने चन्द्रयान मे मून इम्पैक्ट प्रोब (MIP) नाम की डिवाइस लगाई थी।जिसे चन्द्रमा की सतह पर स्थापित होने में 15 दिनों का समय लग गयाथा।

14 Nov 2009 को चंद्रयान चाँद की सतह पर उतरा और भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र मे अपना सिक्का जमाया।इस मामले मे भारत चौथा देश बन गया।इस डिवाइस ने ही चाँद की सतह पर पानी को खोजा था।इस बड़ी खोज के लिए नासा ने भी इसरो की तारीफ़ की थी, क्योंकि ISRO को पहली बार (first attempt) मे ही ये सफलता मिल गयी थी।

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चंद्रयान-2 को 22 July 2019 श्रीहरिकोटा रेंज से भारतीय समयानुसार सफलतापूर्वक भेजा गयाथा।चंद्रयान-2  ने जनवरी 2022 मे उच्च तीव्रता वाले सौर फ्लायर्स के कारण सौर प्रोटोन घटनाओ का पता लगाया जब सूर्य सक्रीय होता है तो सौर फ्लायर्स नामक विस्फोट होते है जो ऊर्जावान कणो को स्पेस में उगलते है।

चाँद के बारे में कुछ रोचक जानकारी

आइये दोस्तों, आपको चाँद की कुछ रोचक जानकारी से अवगत करवाते है:-

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  • रात को आपने सुन्दर से चाँद को चमकते हुए तो जरूर देखा होगा, पर आपको पता है की चाँद की अपनी कोई चमक नहीं होती।जी हाँ, चाँद खुद से नहीं चमकता बल्कि सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है।चन्द्रमा दिन के समय सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है और रात के समय ऊर्जा Release होती है। इसलिए चाँद चमकता हुआ दिखाई देताहै।
  • चन्द्रमा दिन के समय भी आसमाँ में मौजूद होता है।परन्तु सूर्य की बहुत अत्यधिक तेज रोशनी की वजह से ये दिखयी नहीं देता।
  • चाँद पर low gravity की वजह से वजन कम हो जाता है।इसीलिए चाँद पर हलके होने से अंतरिक्ष यात्री ज्यादा उछलकूद कर सकते है।
  • चन्द्र्मा धरती का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।
  • चंदमा सौर परिवार का 5 वाँ सबसे बड़ा प्राकतिक उपग्रह है।
  • इसका आकार क्रिकेट की बॉल की तरह है।
  • चंदमा की आयु 4.53E9 वर्ष है।
  • इसकी परिधि 10921 KM है।
  • चन्द्रमा दूसरा सबसे ज्यादा घनत्व वाला उपग्रह है।पहले स्थान पर बृहस्पति का उपग्रह आयो है।
  • चाँद लगातार पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है और 27.3 दिन में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेता है।
  • यदि हम चाँद पर खड़े होकर धरती को देखे तो पृथ्वी साफ़ साफ़ अपने अक्ष पर घूमती नजर आएगी।
  • वैज्ञानिको के अनुसार चांद में गडढे और पहाड़ है। सबसे ऊँचे पर्वत की ऊँचाई 4700Meter  है।इसका नाम Haijan है।
  • जब चन्द्रमा धरती और सूर्य के बीच आ जाता है तो इस स्थिति को चंदग्रहण कहते है।इस दौरान पृथ्वी के कुछ हिस्सों मे अँधेरा छा जाता है।

चंद्रमा , पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह और निकटतम विशाल खगोलीय पिंड। प्रागैतिहासिक काल से ज्ञात, यह सूर्य के बाद आकाश की सबसे चमकीली वस्तु है । इसे प्रतीक द्वारा निरूपित किया जाता है। अंग्रेजी में इसका नाम, पृथ्वी की तरह, जर्मनिक और पुरानी अंग्रेजी व्युत्पत्ति का है।

पृथ्वी के चंद्रमा के निकट और दूर के भाग
पृथ्वी के चंद्रमा के निकट और दूर के भाग(बाएं) पृथ्वी के चंद्रमा के पास, गैलीलियो अंतरिक्ष यान द्वारा बृहस्पति के रास्ते में फोटो खिंचवाया गया। (दाएं) चंद्रमा का सुदूर भाग जिसमें निकट का कुछ भाग दिखाई दे रहा है (ऊपरी दाएं), अपोलो 16 अंतरिक्ष यान द्वारा फोटो खींचा गया।(बाएं) NASA/JPL/कैल्टेक (NASA फ़ोटो # PIA00405); (दाएं) एफजे डॉयल/नेशनल स्पेस साइंस डाटा सेंटर

चंद्रमा की उजाड़ सुंदरता पूरे इतिहास में आकर्षण और जिज्ञासा का स्रोत रही है और इसने एक समृद्ध सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक परंपरा को प्रेरित किया है। पिछली सभ्यताओं में चंद्रमा को एक देवता के रूप में माना जाता था, इसका प्रभुत्व नाटकीय रूप से ज्वार और महिला प्रजनन क्षमता के चक्र पर अपने लयबद्ध नियंत्रण में प्रकट हुआ था। 

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प्राचीन विद्या और किंवदंती चंद्रमा की शक्ति के बारे में बताती है कि जादू के साथ मंत्र पैदा करने के लिए, मनुष्यों को जानवरों में बदलने के लिए, और लोगों के व्यवहार को पवित्रता और पागलपन (लैटिन लूना , “चंद्रमा” से) के बीच खतरनाक रूप से बहते हुए भेजने के लिए । कवि और संगीतकार चंद्रमा के रोमांटिक का आह्वान कर रहे थेचार्म्स और इसका गहरा पक्ष, और कथा के लेखक अपने पाठकों को चंद्रमा के ऊपर की कक्षा में अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों से बहुत पहले सट्टा चंद्र यात्रा पर ले जा रहे थे , उन्होंने उस वास्तविकता की तस्वीरें वापस भेजीं जो मानव आंखें पहली बार देख रही थीं।

सदियों से अवलोकन और वैज्ञानिक जांच चंद्रमा की प्रकृति और उत्पत्ति पर केंद्रित रही है। चंद्रमा की गति और स्थिति के प्रारंभिक अध्ययन ने ज्वार की भविष्यवाणी की अनुमति दी और कैलेंडर के विकास का नेतृत्व किया । चंद्रमा पहला नया संसार था जिस पर मानव ने पैर रखा था; उन अभियानों से वापस लाई गई जानकारी के साथ-साथ स्वचालित अंतरिक्ष यान और रिमोट-सेंसिंग अवलोकनों द्वारा एकत्र की गई जानकारी ने चंद्रमा के बारे में एक ज्ञान प्राप्त किया है

जो कि पृथ्वी को छोड़कर किसी भी अन्य ब्रह्मांडीय पिंड से अधिक है। हालांकि इसकी संरचना , संरचना और इतिहास के बारे में कई सवाल बने हुए हैं, लेकिन यह स्पष्ट हो गया है कि चंद्रमा पृथ्वी की उत्पत्ति और सौर मंडल को समझने की कुंजी रखता है।

इसके अलावा, पृथ्वी से इसकी निकटता, सामग्री और ऊर्जा के स्रोत के रूप में इसकी समृद्ध क्षमता, और ग्रह विज्ञान के लिए एक प्रयोगशाला के रूप में इसकी योग्यता और विस्तारित समय के लिए अंतरिक्ष में रहने और काम करने के तरीके सीखने के लिए एक जगह को देखते हुए, चंद्रमा एक प्रमुख स्थान बना हुआ है। पृथ्वी की कक्षा से परे मानव जाति की पहली बस्तियों के लिए।

चांदधरतीअनुमानित अनुपात (चंद्रमा से पृथ्वी)
पृथ्वी से औसत दूरी (कक्षीय त्रिज्या)384,400 किमी
पृथ्वी के चारों ओर कक्षा की अवधि (क्रांति की नाक्षत्र अवधि)27.3217 पृथ्वी दिवस
भूमध्य रेखा से ग्रहण तल की ओर झुकाव (पृथ्वी का कक्षीय तल)1.53°23.44°
शरीर के अपने कक्षीय तल के लिए भूमध्य रेखा का झुकाव (कक्षा की ओर झुकाव)6.68°23.44°
पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर कक्षा का झुकाव18.28°−28.58°
पृथ्वी के चारों ओर कक्षा की विलक्षणता0.0549
पृथ्वी से मंदी की दर3.8 सेमी/वर्ष
रोटेशन अवधिकक्षीय अवधि के साथ तुल्यकालिक23.9345 घंटे
माध्य त्रिज्या1,737 किमी6,378 किमी1:4
सतह क्षेत्र37,900,000 किमी510,000,000 किमी 2 (भूमि क्षेत्र, 149,000,000 किमी 2 )1:14
द्रव्यमान0.0735 × 10 24 किग्रा5.976 × 10 24 किग्रा1:81
माध्य घनत्व3.34 ग्राम / सेमी 35.52 ग्राम / सेमी 31:1.7
माध्य सतह गुरुत्वाकर्षण162 सेमी/सेकंड 2980 सेमी/सेकंड 21:6
एस्केप वेलोसिटी2.38 किमी/सेकंड11.2 किमी/सेकंड1:5
औसत सतह का तापमानदिन, 380 के (224 डिग्री फ़ारेनहाइट, 107 डिग्री सेल्सियस); रात, 120 K (−244 °F, −153 °C)288 के (59 डिग्री फारेनहाइट, 15 डिग्री सेल्सियस)
तापमान चरम सीमा396 के (253 डिग्री फ़ारेनहाइट, 123 डिग्री सेल्सियस) से 40 के (-388 डिग्री फ़ारेनहाइट, -233 डिग्री सेल्सियस)330 के (134 डिग्री फारेनहाइट, 56.7 डिग्री सेल्सियस) से 184 के (-128.5 डिग्री फारेनहाइट, -89.2 डिग्री सेल्सियस)
सतह का दबाव3 × 10 −15 बार1 बार1:300 ट्रिलियन
वायुमंडलीय आणविक घनत्वदिन, 10 4 अणु/सेमी 3 ; रात, 2 × 10 5 अणु/सेमी 32.5 × 10 19 अणु/सेमी 3 (मानक तापमान और दबाव पर)लगभग 1:100 ट्रिलियन
औसत गर्मी प्रवाह29 मेगावाट/एम 263 मेगावाट/एम 21:2.2

चंद्रमा एक गोलाकार चट्टानी पिंड है, संभवत: एक छोटे से धातु के कोर के साथ, लगभग 384, 000 किमी (238, 600 मील) की औसत दूरी पर पृथ्वी के चारों ओर थोड़ा सनकी कक्षा में घूमता है। इसका भूमध्यरेखीय त्रिज्या 1,738 किमी (1,080 मील) है, और इसका आकार इस तरह से थोड़ा चपटा है कि यह पृथ्वी की दिशा में थोड़ा ऊपर उठता है। इसका द्रव्यमान वितरण एक समान नहीं है – द्रव्यमान का केंद्र चंद्र क्षेत्र के केंद्र के सापेक्ष पृथ्वी की ओर लगभग 2 किमी (1.2 मील) विस्थापित होता है,

और इसमें सतह द्रव्यमान सांद्रता भी होती है, जिसे कहा जाता हैसंक्षेप में मस्कॉन , जो स्थानीय क्षेत्रों में चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को बढ़ाने का कारण बनता है। चंद्रमा के पास पृथ्वी की तरह कोई वैश्विक चुंबकीय क्षेत्र नहीं है, लेकिन इसकी कुछ सतह चट्टानों में हैअवशेष चुंबकत्व , जो अतीत में चुंबकीय गतिविधि की एक या अधिक अवधियों को इंगित करता है। चंद्रमा में वर्तमान में बहुत मामूली भूकंपीय गतिविधि है और आंतरिक से थोड़ी गर्मी का प्रवाह है, यह संकेत देता है कि अधिकांश आंतरिक गतिविधि बहुत पहले बंद हो गई थी।

वैज्ञानिक अब मानते हैं कि चार अरब साल पहले चंद्रमा हिंसक ताप के अधीन था – शायद इसके गठन से – जिसके परिणामस्वरूप इसका भेदभाव, या रासायनिक पृथक्करण, कम घने क्रस्ट और अधिक घने अंतर्निहित मेंटल में बदल गया। इसके बाद करोड़ों साल बाद हीटिंग का दूसरा एपिसोड आया – इस बार आंतरिक रेडियोधर्मिता से – जिसके परिणामस्वरूप लावा का ज्वालामुखी विस्फोट हुआ । 

चंद्रमा का औसत घनत्व 3.34 ग्राम प्रति घन सेमी है, जो पृथ्वी के मेंटल के करीब है। चंद्रमा के छोटे आकार और द्रव्यमान के कारण, इसकी सतह का गुरुत्वाकर्षण ग्रह के केवल एक-छठे हिस्से के बारे में है; यह इतना कम वातावरण बनाए रखता है कि सतह पर मौजूद किसी भी गैस के अणु बिना टकराए गति करते हैं. सतह को बमबारी से बचाने के लिए एक वायुमंडलीय ढाल की अनुपस्थिति में, क्षुद्रग्रहों से लेकर छोटे कणों तक के आकार के अनगिनत पिंडों ने चंद्रमा को मारा और गड्ढा कर दिया। 

इससे मलबे की परत बन गई है, यारेगोलिथ , जिसमें सभी आकार के चट्टान के टुकड़े बेहतरीन धूल तक शामिल हैं। प्राचीन काल में सबसे बड़े प्रभावों ने महान घाटियां बनाईं, जिनमें से कुछ बाद में आंशिक रूप से भारी लावा बाढ़ से भर गईं। इन महान अंधेरे मैदानों को कहा जाता हैमारिया (एकवचन घोड़ी [लैटिन: “समुद्र”]), पृथ्वी से नग्न आंखों को स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। 

डार्क मारिया और लाइटर हाइलैंड्स, जिनके अपरिवर्तनीय पैटर्न कई लोग “चंद्रमा में आदमी” के रूप में पहचानते हैं, दो मुख्य प्रकार के चंद्र क्षेत्र का गठन करते हैं। शुभंकर ऐसे क्षेत्र हैं जहां विशेष रूप से घने लावा मेंटल से उठे और घाटियों में भर गए। चंद्र पर्वत, जो ज्यादातर प्राचीन घाटियों के किनारों के साथ स्थित हैं, ऊँचे हैं, लेकिन खड़ी या नुकीले नहीं हैं, क्योंकि सभी चंद्र भू-आकृतियाँ प्रभावों की अंतहीन बारिश से नष्ट हो गई हैं।.

की प्रमुख विशेषताएं पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली

इसकी निकटता के अलावा पृथ्वी , चंद्रमा ग्रह की तुलना में अपेक्षाकृत विशाल है – उनके द्रव्यमान का अनुपात अन्य प्राकृतिक उपग्रहों की तुलना में उन ग्रहों की तुलना में बहुत बड़ा है जिनकी वे परिक्रमा करते हैं। परिणामस्वरूप चंद्रमा और पृथ्वी एक दूसरे पर एक मजबूत गुरुत्वाकर्षण प्रभाव डालते हैं, जिससे एक प्रणाली बनती है जिसमें अपने स्वयं के विशिष्ट गुण और व्यवहार होते हैं 

अर्थराइज
अर्थराइज चंद्र क्षितिज से ऊपर उठती हुई पृथ्वी, दिसंबर 1968 में अपोलो 8 अंतरिक्ष यान से एक अभूतपूर्व दृश्य कैप्चर किया गया था, क्योंकि इसकी कक्षा ने इसे चंद्रमा के दूर की ओर ले जाया था। अंतरिक्ष यात्री विलियम एंडर्स द्वारा ली गई इस तस्वीर को अर्थराइज के नाम से जाना जाता है ।नासा
चंद्रमा के आकार के सापेक्ष पृथ्वी
चंद्रमा के आकार के सापेक्ष पृथ्वीपृथ्वी (बाएं) और चंद्रमा को पैमाने पर दिखाया गया है।(बाएं) नासा/गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर; (दाएं) © Getideaka/Shutterstock.com

यद्यपि चंद्रमा को आमतौर पर पृथ्वी की परिक्रमा के रूप में वर्णित किया जाता है, यह कहना अधिक सटीक है कि दोनों पिंड एक दूसरे के द्रव्यमान के एक सामान्य केंद्र के बारे में परिक्रमा करते हैं। इसको कॉल किया गयाबैरीसेंटर, यह बिंदु पृथ्वी के अंदर इसके केंद्र से लगभग 4,700 किमी (2,900 मील) की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा अधिक सटीक रूप से, यह पृथ्वी के केंद्र के बजाय बैरीसेंटर है,

जो केप्लर के ग्रहों की गति के नियमों के अनुसार सूर्य के चारों ओर एक अण्डाकार पथ का अनुसरण करता है । चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य की कक्षीय ज्यामिति चंद्रमा के चरण s और चंद्र और सूर्य ग्रहण की घटनाओं को जन्म देती है ।

पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की ज्यामिति और गति
पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की ज्यामिति और गतिएनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, इंक।

चंद्रमा चार मुख्य चरणों को प्रदर्शित करता है: नया,पहली तिमाही , पूर्ण, औरपिछली तिमाही ।अमावस्या तब होती है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच होता है, और इस प्रकार चंद्रमा का वह भाग जो छाया में होता है, पृथ्वी का सामना करता है।

पूर्णिमा तब होती है जब चंद्रमा सूर्य से पृथ्वी के विपरीत दिशा में होता है, और इस प्रकार चंद्रमा का जो भाग प्रकाशित होता है वह पृथ्वी का सामना करता है। पहली और आखिरी तिमाही, जिसमें आधा चंद्रमा प्रकाशित होता है, तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी से देखे जाने पर सूर्य के संबंध में समकोण पर होता है। (पृथ्वी, जैसा कि चंद्रमा से देखा जाता है, समान चरणों को विपरीत क्रम में दिखाता है – जैसे, चंद्रमा के नए होने पर पृथ्वी भर जाती है।)

जानें खगोलीय घटना के बारे में पांच तथ्य जो तब घटित होती है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुजरता है
जानें खगोलीय घटना के बारे में पांच तथ्य जो तब घटित होती है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुजरता हैसूर्य ग्रहण के बारे में अधिक जानें, जिसमें अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत से उनका संबंध शामिल है।एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, इंक। इस लेख के सभी वीडियो देखें

पृथ्वी पर एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से, aसूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, और aचंद्र ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य द्वारा डाली गई पृथ्वी की छाया में चला जाता है। सूर्य ग्रहण अमावस्या पर होता है, और चंद्र ग्रहण पूर्णिमा पर होता है। ग्रहण हर महीने नहीं होते हैं, क्योंकि चंद्रमा की कक्षा का विमान सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा की ओर झुकता है (ग्रहण) लगभग 5 °। इसलिए, अधिकांश अमावस्या और पूर्णिमा पर, पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा एक सीधी रेखा में नहीं होते हैं।

डिस्कवर करें कि चंद्रमा की समान अवधि के घूर्णन और क्रांति पृथ्वी की ओर उसके उन्मुखीकरण को कैसे प्रभावित करते हैं
डिस्कवर करें कि चंद्रमा की समान अवधि के घूर्णन और क्रांति पृथ्वी की ओर उसके उन्मुखीकरण को कैसे प्रभावित करते हैंस्पष्टीकरण क्यों चंद्रमा का केवल एक पक्ष पृथ्वी का सामना करता है।एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, इंक।इस लेख के सभी वीडियो देखें

पृथ्वी, सूर्य और ग्रहों के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण के कारण चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी व्यापक रूप से भिन्न होती है। उदाहरण के लिए, 20वीं शताब्दी के अंतिम तीन दशकों में, चंद्रमा का अपभू—पृथ्वी से एक परिक्रमण में सबसे दूर की दूरी—लगभग 404,000 और 406,700 किमी (251,000 और 252,700 मील) के बीच था, जबकि इसकी उपभू—सबसे नज़दीकी थी यह पृथ्वी पर आता है – लगभग 356,500 और 370,400 किमी (221,500 और 230,200 मील) के बीच। 

ज्वारीय अंतःक्रियाओं, दूसरे के गुरुत्वाकर्षण आकर्षण के कारण प्रत्येक शरीर में चक्रीय विकृति ने चंद्रमा की स्पिन को इस तरह से तोड़ दिया है कि वह अब उसी दर से घूमता है जैसे वह पृथ्वी के चारों ओर घूमता है और इस प्रकार हमेशा ग्रह का सामना करने वाला एक ही पक्ष रखता है । जैसा कि इटली में जन्मे फ्रांसीसी खगोलशास्त्री ने खोजा था1692 में जियान डोमेनिको कैसिनी , चंद्रमा कास्पिन अक्ष अपने कक्षीय तल के संबंध में आगे बढ़ता है – अर्थात, समय के साथ इसका अभिविन्यास धीरे-धीरे बदलता है, एक वृत्ताकार पथ का पता लगाता है। ( चंद्रमा की गति के बारे में कैसिनी द्वारा तैयार किए गए अनुभवजन्य नियमों के लिए, कैसिनी के नियम देखें ।)

केप्लर के दूसरे नियम के अनुसार, चंद्रमा की कक्षा की विलक्षणता के परिणामस्वरूप उसकी कक्षा के उस हिस्से में पृथ्वी के निकट की यात्रा तेजी से होती है और दूर के हिस्से में धीमी गति से चलती है। चंद्रमा की निरंतर स्पिन दर के साथ, गति में ये परिवर्तन एक स्पष्ट दोलन, या कंपन को जन्म देते हैं , जो समय के साथ पृथ्वी पर एक पर्यवेक्षक को चंद्र सतह के आधे से अधिक भाग को देखने की अनुमति देता है। 

इस स्पष्ट मोड़ गति के अलावा, चंद्रमा वास्तव में देशांतर और अक्षांश दोनों में थोड़ा-थोड़ा हिलता है, और पर्यवेक्षक का सुविधाजनक बिंदु पृथ्वी के घूर्णन के साथ चलता है। इन सभी गतियों के फलस्वरूप चन्द्रमा की सतह का 59 प्रतिशत से अधिक भाग किसी न किसी समय पृथ्वी से देखा जा सकता है।

गर्भ और उपछाया, आंशिक और कुल ग्रहण, और सौर और कुंडलाकार ग्रहणों के बीच अंतर करें

कक्षीय विलक्षणता सौर ग्रहणों को भी प्रभावित करती है, जिसमें चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुजरता है, जिससे पृथ्वी की सूर्य की सतह पर एक चलती हुई छाया पड़ती है। यदि चन्द्रमा के निकट होने पर सूर्य ग्रहण लगता हैपेरिगी , चंद्रमा के अंधेरे आंतरिक छाया ( छाता ) के पथ के साथ पर्यवेक्षक देखें aकुल ग्रहण । यदि चंद्रमा निकट हैभू , यह सूर्य को पूरी तरह से ढकता नहीं है; परिणामी ग्रहण हैकुंडलाकार , और पर्यवेक्षक चंद्रमा के सिल्हूट के चारों ओर सौर डिस्क की एक पतली अंगूठी देख सकते हैं ।

चंद्रमा और पृथ्वी वर्तमान में 27.322 दिनों में द्विकेंद्र की परिक्रमा करते हैं,नाक्षत्र मास , या चंद्रमा की नाक्षत्र क्रांति अवधि। चूंकि पूरी प्रणाली साल में एक बार सूर्य के चारों ओर घूम रही है, रोशनी का कोण प्रति दिन लगभग एक डिग्री बदलता है, जिससे एक पूर्णिमा से अगले तक का समय 29.531 दिन है। सिनोडिक महीना , या चंद्रमा की सिनोडिक क्रांति अवधि। नतीजतन, चंद्रमा का टर्मिनेटर – दिन और रात के बीच की विभाजन रेखा – इस सिनॉडिक अवधि में चंद्रमा के चारों ओर एक बार घूमती है,

जो अधिकांश स्थानों को लगभग 15 पृथ्वी दिनों में सूर्य के प्रकाश और अंधेरे की बारी-बारी से उजागर करती है। ज्वारीय अंतःक्रियाओं के कारण समय के साथ नाक्षत्र और सिनोडिक काल धीरे-धीरे बदल रहे हैं। यद्यपि ज्वारीय घर्षण पृथ्वी के घूर्णन को धीमा कर रहा है, संवेग का संरक्षण यह निर्धारित करता है कि पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली का कोणीय संवेग स्थिर रहता है। नतीजतन, चंद्रमा धीरे-धीरे पृथ्वी से हट रहा है, जिसके

परिणामस्वरूप दिन और महीने दोनोंलंबे होते जा रहे हैं। इस संबंध को अतीत में विस्तारित करते हुए, दोनों अवधि सैकड़ों लाखों साल पहले काफी कम रही होगी -जीवाश्म मूंगों के दैनिक और ज्वार से संबंधित विकास के छल्ले के माप से पुष्टि की गई एक परिकल्पना ।

क्योंकि चंद्रमा की स्पिन अक्ष क्रांतिवृत्त के तल (सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा का तल) के लगभग लंबवत है – ऊर्ध्वाधर से केवल 1 1/2 ° झुका हुआ है  चंद्रमा का कोई मौसम नहीं है। चंद्र ध्रुवों पर सूर्य का प्रकाश हमेशा लगभग क्षैतिज होता है, जिसके परिणामस्वरूप गहरे गड्ढों के तल पर स्थायी रूप से ठंडे और अंधेरे वातावरण होते हैं।

चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव पर देखें
चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव पर देखेंचंद्र उत्तरी ध्रुव पर देखें, गैलीलियो अंतरिक्ष यान द्वारा एकत्र की गई छवियों से बने मोज़ेक में, जैसा कि यह 7 दिसंबर, 1992 को चंद्रमा द्वारा उड़ान भरी थी। क्योंकि चंद्रमा की घूर्णी धुरी केवल एक्लिप्टिक प्लेन की ओर झुकी हुई है, टर्मिनेटर – विभाजित करने वाली रेखा छाया से प्रकाश-प्रकाश कभी भी किसी भी ध्रुव से दूर नहीं होता है, और ध्रुवों पर प्राप्त होने वाला सूर्य का प्रकाश हमेशा लगभग क्षैतिज होता है। इस छवि में, उत्तरी ध्रुव टर्मिनेटर के रास्ते के लगभग एक तिहाई छायांकित क्षेत्र के भीतर स्थित है, जो ऊपर बाईं ओर से शुरू होता है।नासा/जेपीएल

चंद्रमा की गति

न केवल चंद्रमा के बारे में बल्कि आकाशीय यांत्रिकी और भौतिकी के मूल सिद्धांतों के बारे में ज्ञान के विकास के लिए चंद्रमा की गति का अध्ययन केंद्रीय रहा है। जैसे पृथ्वी के दैनिक घूर्णन और सूर्य के बारे में इसकी वार्षिक गति के कारण तारे पश्चिम की ओर बढ़ते हुए दिखाई देते हैं , इसलिए चंद्रमा धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ता है, प्रत्येक दिन बाद में उदय होता है और इसके माध्यम से गुजरता हैचरण : नया, पहली तिमाही, पूर्ण, अंतिम तिमाही, और हर महीने फिर से नया । 

लंबे समय से चल रहे चीनी, कसदियन और मायानोकैलेंडर इन दोहराव लेकिन असंगत आंदोलनों को समेटने के प्रयास थे । बेबीलोन के ज्योतिषियों और यूनानी खगोलविदों के समय से लेकर वर्तमान तक, जांचकर्ताओं ने भविष्यवाणी की गति से छोटे विचलन की तलाश की। 

अंग्रेजी भौतिक विज्ञानीआइजैक न्यूटन ने 17 वीं शताब्दी के अंत में गुरुत्वाकर्षण के अपने सिद्धांत को विकसित करने में चंद्र टिप्पणियों का इस्तेमाल किया , और वह चंद्रमा की गति को खराब करने में सौर गुरुत्वाकर्षण के कुछ प्रभावों को दिखाने में सक्षम था। 18वीं और 19वीं शताब्दी तक, चंद्र आंदोलनों का गणितीय अध्ययन, दोनों कक्षीय और घूर्णी, आगे बढ़ रहा था,

नेविगेशन के लिए आकाशीय पिंडों ( इफेमेराइड्स ) की अनुमानित स्थिति की सटीक तालिकाओं की आवश्यकता से प्रेरित था । जबकि सिद्धांत बेहतर टिप्पणियों के साथ विकसित हुआ, कई छोटी और गूढ़ विसंगतियां सामने आती रहीं। यह धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि कुछ पृथ्वी की घूर्णन दर में अनियमितताओं से उत्पन्न होते हैं, अन्य पृथ्वी और चंद्रमा पर छोटे ज्वारीय प्रभावों से उत्पन्न होते हैं।

चन्द्र कलाएं
चन्द्रमा की कलाएँ।© मारेमा / शटरस्टॉक

अंतरिक्ष अन्वेषण ने बहुत अधिक सटीकता की आवश्यकता लाई, और साथ ही, तेज कंप्यूटर और नए अवलोकन उपकरण की उपलब्धता ने इसे प्राप्त करने के साधन प्रदान किए। विश्लेषणात्मक उपचार- पृथ्वी, सूर्य और ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव का प्रतिनिधित्व करने वाले शब्दों की एक श्रृंखला के साथ चंद्रमा की गति का गणितीय मॉडलिंग- चंद्रमा के लिए गति के समीकरणों के प्रत्यक्ष संख्यात्मक एकीकरण के आधार पर विधियों का मार्ग प्रशस्त करता है। दोनों विधियों में अवलोकन के आधार पर महत्वपूर्ण इनपुट की आवश्यकता थी,

लेकिन बाद के उपयोग से भविष्यवाणियों की सटीकता में काफी वृद्धि हुई। उसी समय, ऑप्टिकल और रेडियो अवलोकनों में काफी सुधार हुआ- अपोलो द्वारा चंद्र सतह पर रखे गए रिट्रोरेफ्लेक्टरअंतरिक्ष यात्रियों ने पृथ्वी से चंद्रमा की लेजर रेंज की अनुमति दी, और रेडियो खगोल विज्ञान की नई तकनीकों , जिसमें बहुत लंबी बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री ( दूरबीन देखें : बहुत लंबी बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री ) शामिल हैं, ने आकाशीय रेडियो स्रोतों के अवलोकन की अनुमति दी क्योंकि चंद्रमा ने उन्हें गुप्त रखा था। 

इन प्रेक्षणों ने, सेंटीमीटर के क्रम में सटीकता के साथ, वैज्ञानिकों को स्थलीय ज्वारीय गति विनिमय के कारण चंद्रमा की गति में परिवर्तन को मापने में सक्षम बनाया है , सापेक्षता के सिद्धांतों की उन्नत समझ है , और चंद्रमा और पृथ्वी दोनों के बेहतर भूभौतिकीय ज्ञान की ओर अग्रसर हैं। .ब्रिटनी प्रश्नोत्तरीग्रह और पृथ्वी का चंद्रमादूर के ग्रहों और कथित अलौकिक जीवन के बीच क्या संबंध है? हमारे सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह कौन सा है? अपनी सोच की टोपी- और सीट बेल्ट– पर पट्टी बांधें और इस प्रश्नोत्तरी में अपने खगोल विज्ञान ज्ञान का परीक्षण करें।

वायुमंडल

यद्यपि चंद्रमा आमतौर पर पृथ्वी पर प्रयोगशालाओं में बनाए गए वैक्यूम से अधिक होता है, लेकिन इसका वातावरण व्यापक और उच्च वैज्ञानिक रुचि का है। दो सप्ताह की दिन की अवधि के दौरान, परमाणु और अणु चंद्र सतह से विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा निकाले जाते हैं, सौर हवा द्वारा आयनित होते हैं , और फिर विद्युत चुम्बकीय प्रभावों द्वारा एक टकराव रहित प्लाज्मा के रूप में संचालित होते हैं । 

चंद्रमा की अपनी कक्षा में स्थिति वातावरण के व्यवहार को निर्धारित करती है। प्रत्येक महीने के भाग के लिए, जब चंद्रमा पृथ्वी के सूर्य की ओर होता है, वायुमंडलीय गैसें अबाधित सौर हवा से टकराती हैं; कक्षा के अन्य भागों में, वे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर की लम्बी पूंछ के अंदर और बाहर जाते हैं, अंतरिक्ष का एक विशाल क्षेत्र जहां ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र विद्युत आवेशित कणों के व्यवहार पर हावी होता है। इसके अलावा, चंद्रमा की रात में कम तापमान और स्थायी रूप से छायांकित ध्रुवीय क्रेटर संघनित गैसों के लिए ठंडे जाल प्रदान करते हैं।

अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा चंद्र सतह पर रखे गए उपकरणों ने चंद्रमा के वायुमंडल के विभिन्न गुणों को मापा, लेकिन डेटा का विश्लेषण मुश्किल था क्योंकि वायुमंडल के अत्यधिक पतलेपन ने अपोलो से उत्पन्न गैसों से संदूषण को एक महत्वपूर्ण कारक बना दिया। प्राकृतिक रूप से मौजूद मुख्य गैसें हैं नियॉन ,हाइड्रोजन ,हीलियम , औरआर्गन । 

आर्गन ज्यादातर रेडियोजेनिक होता है – यानी, यह रेडियोधर्मी पोटेशियम के क्षय से चंद्र चट्टानों से निकलता है । आर्गन को संघनित करने के लिए चंद्र रात का तापमान काफी कम होता है, लेकिन नियॉन, हाइड्रोजन या हीलियम के लिए नहीं, जो सौर हवा में उत्पन्न होते हैं और मिट्टी के कणों में प्रत्यारोपित होने तक गैसों के रूप में वातावरण में रहते हैं।

निकट-सतह गैसों और चंद्रमा के चारों ओर पाए जाने वाले व्यापक सोडियम -पोटेशियम बादल के अलावा (नीचे प्रभाव और ज्वालामुखी के प्रभाव अनुभाग देखें ), चंद्र सतह के कुछ मीटर के भीतर धूल की एक छोटी मात्रा फैलती है। ऐसा माना जाता है कि यह इलेक्ट्रोस्टैटिक रूप से निलंबित है।

बड़े पैमाने पर विशेषताएं

दूरबीन या एक छोटी दूरबीन के साथ, एक पर्यवेक्षक मारिया और हाइलैंड्स के पैटर्न के अलावा चंद्रमा के निकट की ओर का विवरण देख सकता है । जैसे ही चंद्रमा अपने चरणों से गुजरता है,टर्मिनेटर चंद्रमा की डिस्क पर धीरे-धीरे चलता है, इसकी लंबी छाया पहाड़ों और गड्ढों की राहत को प्रकट करती है। परपूर्णिमा पर राहत गायब हो जाती है, जो हल्की और गहरे रंग की सतहों के बीच के अंतर से बदल जाती है। 

हालांकि पूर्णिमा रात में चमकीली होती है, चंद्रमा वास्तव में एक काली वस्तु है, जो उस पर पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश के केवल कुछ प्रतिशत (अल्बेडो 0.07) को दर्शाती है। 17वीं शताब्दी की शुरुआत में इतालवी वैज्ञानिक गैलीलियो के रेखाचित्रों से शुरू होकर 19वीं शताब्दी तक जारी रहा।खगोलविदों ने कुछ किलोमीटर के रिज़ॉल्यूशन के लिए दृश्यमान विशेषताओं को मैप किया और नाम दिया, जो कि पृथ्वी के अशांत वातावरण के माध्यम से चंद्रमा को दूरबीन से देखने पर सबसे अच्छा हो सकता है। 

काम बर्लिन और एथेंस में पर्यवेक्षकों द्वारा बनाए गए एक महान हाथ से तैयार चंद्र एटलस में समाप्त हुआ। इसके बाद एक लंबा अंतराल आया क्योंकि खगोलविदों ने अपना ध्यान चंद्रमा से परे 20 वीं शताब्दी के मध्य तक लगाया, जब यह स्पष्ट हो गया कि चंद्रमा की मानव यात्रा अंततः संभव हो सकती है। 1950 के दशक में एक और महान एटलस संकलित किया गया था, इस बार 1960 में अमेरिकी वायु सेना के प्रायोजन के तहत एक फोटोग्राफिक प्रकाशित किया गया था।

खगोलविदों ने लंबे समय तक बहस की कि क्या चंद्रमा की स्थलाकृतिक विशेषताएं किसके कारण हुई हैं ज्वालामुखी _ केवल 20वीं सदी में का प्रभुत्व थाचंद्र सतह के आकार में प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। प्रत्येक उच्चभूमि क्षेत्र में भारी गड्ढा है – बड़े पिंडों के साथ बार-बार टकराव के प्रमाण। (पृथ्वी की भूगर्भीय गतिविधि और अपक्षय के कारण पृथ्वी पर समान बड़े प्रभाव संरचनाओं का अस्तित्व अपेक्षाकृत दुर्लभ है।) दूसरी ओर, मारिया बहुत कम क्रेटरिंग दिखाती है और इस प्रकार काफी छोटी होनी चाहिए। 

पर्वत ज्यादातर प्राचीन प्रभाव घाटियों के उत्क्षेपण रिम्स के भाग हैं । चंद्रमा के भीतर ज्वालामुखीय गतिविधि हुई है, लेकिन परिणाम ज्यादातर पृथ्वी पर मौजूद लोगों से काफी अलग हैं। मारिया बनाने के लिए बाढ़ में ऊपर उठने वाले लावा बेहद तरल थे। ज्वालामुखी पर्वत निर्माण के साक्ष्य जैसा कि पृथ्वी पर हुआ है, छोटे, निम्न गुंबदों के कुछ क्षेत्रों तक सीमित है।

सहस्राब्दियों से लोग इसकी उपस्थिति के बारे में सोचते थे चंद्रमा का अदृश्य पक्ष । सोवियत अंतरिक्ष जांच की उड़ान के साथ रहस्य दूर होने लगालूना 3 1959 में, जिसने दूर की ओर की पहली तस्वीरें लौटा दीं। निकट की ओर के विपरीत, लूना 3 छवियों में प्रदर्शित सतह में ज्यादातर हाइलैंड्स शामिल थे, जिसमें केवल गहरे रंग की घोड़ी सामग्री के छोटे क्षेत्र थे। बाद के मिशनों से पता चला कि प्राचीन दूर-दराज के उच्चभूमि विशाल घाटियों से घिरे हुए हैं लेकिन ये घाटियां लावा से नहीं भरी हैं।

चंद्रमा के दूर की ओर
चंद्रमा के दूर की ओर पृथ्वी से चंद्रमा का दृश्य कभी नहीं देखा गया, मुख्य रूप से भारी गड्ढा वाला दूर की ओर, अप्रैल 1972 में अपोलो 16 अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा खींचा गया। निकट-पक्ष प्रभाव बेसिन मारे क्रिसियम ऊपरी बाएं अंग पर बड़ा काला निशान है; इसके नीचे के दो अंधेरे क्षेत्र घोड़ी मार्जिनिस (करीब क्रिसियम) और मारे स्माइथी हैं। हालाँकि दूर का भाग विशाल घाटियों से अच्छी तरह से झुलसा हुआ है, लेकिन ये कभी भी लावा से नहीं भरते हैं जिससे मारिया बनती है।एफजे डॉयल/नेशनल स्पेस साइंस डाटा सेंटर
चंद्रमा के दूर की ओर
चंद्रमा के दूर की ओर अपोलो 11 मिशन, 1969 के दौरान खींचे गए चंद्रमा के दूर के हिस्से की तस्वीर।नासा

प्रभावों और ज्वालामुखी के प्रभाव

प्रभावों के प्रमुख परिणाम प्रत्येक चंद्र दृश्य में देखे जाते हैं। सबसे बड़े पैमाने पर प्राचीन घाटियाँ हैं, जो सैकड़ों किलोमीटर तक फैली हुई हैं। एक सुंदर उदाहरण ओरिएंटेल बेसिन है, या घोड़ी ओरिएंटेल , जिसकी पहाड़ की दीवारें चंद्रमा के अंग (चंद्र डिस्क के स्पष्ट किनारे) के पास पृथ्वी से देखी जा सकती हैं, जब चंद्र मुक्ति अनुकूल होती है। इसकी बहु-अंगूठी प्राचीर सबसे बड़े घाटियों की विशेषता है; वे छल्ले के बीच निचले क्षेत्रों के आंशिक लावा बाढ़ से उच्चारण होते हैं। ओरिएंटल बेसिन चंद्रमा पर सबसे कम उम्र का बड़ा प्रभाव वाला बेसिन प्रतीत होता है।

मून्स ओरिएंटेल बेसिन, 1967
मून्स ओरिएंटेल बेसिन, 1967 चंद्र ऑर्बिटर 4 अंतरिक्ष यान द्वारा 1967 में ली गई एक तस्वीर में चंद्रमा पर मल्टी-रिंगेड ओरिएंटेल बेसिन, या घोड़ी ओरिएंटेल। विशाल प्रभाव संरचना का सबसे बाहरी रिम, कॉर्डिलेरा पर्वत, व्यास में 930 किमी (580 मील) है। ओरिएंटल चंद्र के पश्चिमी अंग के निकट स्थित है। अन्य निकटवर्ती घाटियों के विपरीत, यह केवल आंशिक रूप से घोड़ी लावाओं से भरा हुआ है, जो बेसिन संरचना की जांच की अनुमति देता है।नासा/चंद्र ग्रह संस्थान

ओरिएंटल का नाम से उत्पन्न होता है चंद्र-मानचित्रण सम्मेलन। 17वीं-19वीं शताब्दी में दूरबीन अवलोकन के महान युग के दौरान, चंद्रमा के चित्रण आमतौर पर दक्षिण में सबसे ऊपर दिखाई देते थे क्योंकि दूरबीनों ने छवि को उल्टा कर दिया था। पूर्व और पश्चिम ने आकाश में उन दिशाओं को संदर्भित किया- यानी, चंद्रमा पूर्व की ओर बढ़ता है और इसलिए इसका प्रमुख अंग पूर्व था, और बेसिन का जो हिस्सा पृथ्वी से देखा जा सकता था,

उसे तदनुसार मारे ओरिएंटेल कहा जाता था। मानचित्रण के उद्देश्यों के लिए चंद्र निर्देशांक को भूमध्य रेखा के चौराहे पर और माध्य लिब्रेशन द्वारा परिभाषित एक मेरिडियन पर, निकट-पक्ष के केंद्र के पास उत्पन्न होने के लिए लिया गया था। एक छोटा गड्ढा,मोस्टिंग ए, को संदर्भ बिंदु के रूप में स्वीकार किया गया था। 

चंद्रमा के साथ एक दुनिया के रूप में माना जाता है, न कि केवल आकाश में घूमने वाली एक डिस्क के बजाय, पूर्व और पश्चिम आपस में जुड़ जाते हैं। इस प्रकार, ओरिएंटेल, अपने नाम के बावजूद, पश्चिमी चंद्र देशांतर पर स्थित है।इस विषय पर और पढ़ेंमून लैंडिंग: जस्ट द फैक्ट्स 1969 यूएस मून लैंडिंग के बारे में आपको क्या जानने की जरूरत है ।

दसियों किलोमीटर से लेकर सूक्ष्म आकार तक के व्यास वाले छोटे प्रभाव विशेषताओं को शब्द द्वारा वर्णित किया गया हैगड्ढा । चंद्र क्रेटरों की सापेक्ष आयु उनके रूप और संरचनात्मक विशेषताओं द्वारा इंगित की जाती है। युवा क्रेटरों में ऊबड़ खाबड़ प्रोफाइल होते हैं और वे मलबे के कूबड़ वाले कंबल से घिरे होते हैं, जिन्हें इजेक्टा कहा जाता है, और चंद्र सतह से टकराने वाली निष्कासित सामग्री द्वारा बनाई गई लंबी हल्के रंग की किरणें होती हैं। निरंतर बमबारी के परिणामस्वरूप पुराने क्रेटर ने प्रोफाइल को गोल और वश में कर लिया है।

कोपरनिकस क्रेटर, दिसंबर 1972
कोपरनिकस क्रेटर, दिसंबर 1972कोपरनिकस क्रेटर, दिसंबर 1972 में चंद्रमा के ऊपर अपोलो 17 अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा फोटो खिंचवाया गया था। निकट की ओर छोटे प्रभाव वाले क्रेटरों में से एक, कोपरनिकस में एक ऊबड़ खाबड़ प्रोफ़ाइल, प्रमुख केंद्रीय चोटियाँ, एक सपाट मंजिल तक उतरती सीढ़ीनुमा सीढ़ीदार दीवारें और एक खुरदरा इजेक्टा कंबल है। गड्ढा 93 किमी (58 मील) के पार है। पूर्णिमा पर पृथ्वी से इसकी चमकदार रेडियल किरणों की प्रणाली आसानी से देखी जा सकती है।नासा

एक गड्ढा के रूप और संरचना से भी के बारे में जानकारी प्राप्त होती है प्रभाव प्रक्रिया । जब कोई पिंड कई किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से बहुत बड़े पिंड से टकराता है, तो उपलब्ध गतिज ऊर्जा पूरी तरह से पिघलने के लिए पर्याप्त होती है, यहां तक ​​कि आंशिक रूप से वाष्पीकृत करने के लिए, अपने लक्ष्य सामग्री के एक छोटे से हिस्से के साथ प्रभावित शरीर को। प्रभाव पर, संपर्क स्थल के चारों ओर इजेक्टा कंबल बनाने के लिए, मलबे की मात्रा के साथ एक पिघली हुई चादर को बाहर फेंक दिया जाता है। 

इस बीच, एक झटका उपसतह में यात्रा करता है, खनिज संरचनाओं को चकनाचूर कर देता है और चट्टानों में एक गप्पी हस्ताक्षर छोड़ देता है। प्रारंभिक कप के आकार की गुहा अस्थिर है और, इसके आकार के आधार पर, विभिन्न तरीकों से विकसित होती है। एक विशिष्ट अंतिम परिणाम महान गड्ढा है Aristarchus , इसकी दीवारों में ढलान वाली छतों और एक केंद्रीय शिखर के साथ। अरिस्टार्चस लगभग 40 किमी (25 मील) व्यास और 4 किमी (2.5 मील) गहरा है।

अरिस्टार्चस के आसपास का क्षेत्र कई अजीबोगरीब चंद्र विशेषताओं को दर्शाता है, जिनमें से कुछ की उत्पत्ति अभी तक अच्छी तरह से नहीं हुई है। अरिस्टार्कस का प्रभाव घोड़ी के उत्तरी भाग के लावा से घिरी एक ऊँची, पुरानी दिखने वाली सतह पर हुआ, जिसे ओशनस प्रोसेलरम के नाम से जाना जाता है। इन लावा प्रवाह ने पुराने गड्ढा को भर दियाप्रिंज़ , जिसका रिम अब केवल आंशिक रूप से दिखाई देता है। 

रिम पर एक बिंदु पर, एक स्पष्ट रूप से ज्वालामुखीय घटना ने एक गड्ढा उत्पन्न किया; बाद में, एक लंबा, घुमावदार चैनल, जिसे a . कहा जाता हैपापी रिल , घोड़ी के पार बहने के लिए उभरा। 1787 में जर्मन खगोलशास्त्री जोहान श्रोटर द्वारा खोजे गए चंद्रमा पर सबसे बड़े सहित अन्य पापी रिल्स पास में पाए जाते हैं। उनके सम्मान में नामित,श्रोटर्स वैली एक गहरा, घुमावदार चैनल है, जो सैकड़ों किलोमीटर लंबा है, जिसमें एक छोटा आंतरिक चैनल है जो पृथ्वी पर धीमी नदियों की तरह ही घूमता है। 

इस “नदी” का अंत बस कुछ भी नहीं है और घोड़ी के मैदानों पर गायब हो जाता है। किसी तरह से इसका हिसाब होना बाकी है, सैकड़ों घन किलोमीटर तरल पदार्थ और खुदाई की गई घोड़ी सामग्री गायब हो गई।

प्रिंज़, दफन मून क्रेटर, 1971
प्रिंज़, दफन मून क्रेटर, 19711971 में अपोलो 15 अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा ली गई एक छवि में चंद्रमा पर प्राचीन, ज्यादातर दफन क्रेटर प्रिंज़ के पास साइनस की लकीरें। माना जाता है कि इस तरह की विशेषताएं पृथ्वी पर लावा प्रवाह द्वारा काटे गए चैनलों के समान हैं, हालांकि उनकी घुमावदार आकृतियों से पता चलता है कि लावा था वर्तमान में पृथ्वी पर ज्ञात की तुलना में बहुत पतला। छवि में सबसे विशिष्ट रील, रीमा प्रिंज़, क्रेटर प्रिंज़ के रिम पर एक छोटे ज्वालामुखीय क्रेटर (ऊपरी केंद्र) से निकलती प्रतीत होती है; यह उत्तर की ओर (नीचे) मुड़ने से पहले क्रेटर रिम के नीचे पश्चिम की ओर (दाएं) जाता है।नासा/गोडार्ड अंतरिक्ष उड़ान केंद्र

भूकंपीय और ऊष्मा-प्रवाह माप के परिणाम बताते हैं कि कोई भीचंद्रमा पर बनी रहने वाली ज्वालामुखी गतिविधि पृथ्वी की तुलना में मामूली है। वर्षों से विश्वसनीय पर्यवेक्षकों ने संभावित ज्वालामुखी प्रकृति की क्षणिक घटनाओं को देखने की सूचना दी है, और उनके लिए कुछ स्पेक्ट्रोस्कोपिक साक्ष्य मौजूद हैं। 1980 के दशक के अंत में चंद्रमा के चारों ओर सोडियम और पोटेशियम परमाणुओं का एक बादल देखा गया था,

लेकिन यह जरूरी नहीं कि ज्वालामुखी उत्सर्जन का परिणाम हो। यह संभव है कि चंद्र सतह और सौर हवा की परस्पर क्रिया ने बादल का निर्माण किया हो। किसी भी मामले में, यह सवाल खुला रहता है कि क्या चंद्रमा ज्वालामुखी रूप से सक्रिय है।

19वीं शताब्दी में शुरू हुए टेलीस्कोपिक पर्यवेक्षकों ने इस शब्द का प्रयोग कियाकई प्रकार की ट्रेंच जैसी चंद्र विशेषताओं के लिए रिले। सिन्युअस रिल्स के अलावा, सीधी और शाखाओं वाली रिल्स होती हैं जो टेंशन क्रैक के रूप में दिखाई देती हैं, और इनमें से कुछ—जैसे किरीमा हाइगिनस और बड़े पुराने क्रेटर के तल के चारों ओर की लकीरेंअल्फांसस- रिमलेस इरप्शन क्रेटर से भरा हुआ है। 

हालांकि चंद्रमा तनाव और संपीड़न दोनों विशेषताओं को दिखाता है (कम शिकन लकीरें, आमतौर पर घोड़ी मार्जिन के पास, संपीड़न के परिणामस्वरूप हो सकती हैं), यह पृथ्वी की पपड़ी में दोषों द्वारा चिह्नित प्लेट टेक्टोनिक्स के बड़े, पार्श्व गतियों का अनुभव करने का कोई सबूत नहीं देता है।

चंद्र सतह की सबसे गूढ़ विशेषताओं में से कई हल्के, घूमने वाले पैटर्न हैं जिनमें कोई संबद्ध स्थलाकृति नहीं है । एक प्रमुख उदाहरण है रेनर गामा , ओशनस प्रोसेलरम के दक्षिणपूर्वी भाग में स्थित है। जबकि अन्य अपेक्षाकृत उज्ज्वल विशेषताएं मौजूद हैं – जैसे, क्रेटर किरणें – उन्हें प्रभाव प्रक्रिया के परिणामों के रूप में समझाया गया है। रेनर गामा जैसी सुविधाओं की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं है। 

कुछ वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि वे धूमकेतु के प्रभावों के निशान हैं, जिसमें प्रभावित शरीर आकार में बड़ा था लेकिन इतना कम घनत्व था कि कोई गड्ढा नहीं पैदा हो। रेनर गामा इस मायने में भी असामान्य है कि यह क्रस्ट में एक बड़ी चुंबकीय विसंगति (चुंबकीय अनियमितता का क्षेत्र) के साथ मेल खाता है।

रेनर गामा, लूनर ऑर्बिटर 2, नवंबर 1966 द्वारा फोटो खिंचवाया गया
रेनर गामा, लूनर ऑर्बिटर 2, नवंबर 1966 द्वारा फोटो खिंचवाया गया नवंबर 1966 में लूनर ऑर्बिटर 2 द्वारा खींची गई रेनर गामा। यह गूढ़ चंद्र विशेषता उज्ज्वल ज़ुल्फ़ पैटर्न दिखाती है लेकिन कोई स्पष्ट स्थलाकृतिक राहत नहीं है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि यह धूमकेतु के प्रभाव का धूल भरा निशान है।एलजे कोसोफ्स्की/राष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान डाटा सेंटर

छोटे पैमाने की विशेषताएं

छोटे-से-सूक्ष्म पैमाने पर, चंद्र सतह के गुणों को घटनाओं के संयोजन द्वारा नियंत्रित किया जाता है – आगमन के कारण प्रभाव प्रभाव, दसियों किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से, उल्कापिंड सामग्री के आकार से लेकर अंशों तक। एक माइक्रोमीटर; सौर-पवन , कॉस्मिक-रे , और सौर-फ़्लेयर कणों द्वारा बमबारी ; आयनीकरण विकिरण; तथा तापमान चरम। 

बिना किसी मौसम संबंधी प्रभाव के और पर्याप्त वातावरण से असुरक्षित, सबसे ऊपरी सतह दिन के दौरान लगभग 400 केल्विन (K; 260 °F, 127 °C) तक पहुँच जाती है और 100 K (−279 °F, −173 °C) से नीचे गिर जाती है। रात को। रेजोलिथ की शीर्ष परत, हालांकि, इसकी उच्च सरंध्रता (बड़ी संख्या में voids, या ताकना रिक्त स्थान, मात्रा की प्रति इकाई) के कारण एक कुशल इन्सुलेटर के रूप में कार्य करती है। नतीजतन, दैनिक तापमान में उतार-चढ़ाव मिट्टी में एक मीटर (लगभग तीन फीट) से भी कम हो जाता है।

मानव द्वारा रेजोलिथ को प्रत्यक्ष रूप से देखने से बहुत पहले, पृथ्वी-आधारित खगोलविदों ने कई प्रकार के मापों से निष्कर्ष निकाला कि चंद्रमा की सतह बहुत ही अजीब होनी चाहिए। से सबूत फोटोमेट्री (चमक माप) विशेष रूप से हड़ताली है। पृथ्वी से पूरी तरह से प्रकाशित चंद्रमा केवल आधा प्रकाशित के रूप में 11 गुना उज्ज्वल है, और यह डिस्क के किनारे तक उज्ज्वल दिखाई देता है। 

रोशनी की दिशा में वापस परावर्तित सूर्य के प्रकाश की मात्रा का मापन कारण बताता है: एक छोटे पैमाने पर सतह बेहद खुरदरी होती है, और खनिज अनाज और गहरी गुहाओं के भीतर से परावर्तित प्रकाश तब तक छाया रहता है जब तक रोशनी स्रोत सीधे पर्यवेक्षक के पीछे न हो – यानी , पूर्णिमा तक — जिस समय प्रकाश अचानक गुहाओं से परावर्तित हो जाता है। परावर्तित प्रकाश के ध्रुवीकरण गुण बताते हैं कि सतह सूक्ष्म पैमाने पर भी खुरदरी है।

चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान के उतरने से पहले , खगोलविदों के पास रेजोलिथ परत की गहराई को मापने के लिए कोई सीधा साधन नहीं था। फिर भी, इन्फ्रारेड डिटेक्टरों के विकास के बाद उन्हें दूरबीन के माध्यम से सटीक थर्मल अवलोकन करने की इजाजत दी गई, वे अंततः बाहरी सतह विशेषताओं के बारे में कुछ उचित निष्कर्ष निकाल सकते थे। जैसे चंद्र के दौरान पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है ग्रहण , चंद्र सतह तेजी से ठंडी होती है, लेकिन शीतलन असमान है,

अपेक्षाकृत युवा क्रेटरों के पास धीमा होने के कारण जहां उजागर चट्टान क्षेत्रों की उम्मीद की जानी है। इस व्यवहार की व्याख्या यह दिखाने के लिए की जा सकती है कि अत्यधिक इन्सुलेट परत काफी उथली है, अधिकतम कुछ मीटर। हालांकि सभी खगोलविदों ने पहले इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया, लेकिन 1960 के दशक के मध्य में इसकी पुष्टि हुई जब पहला रोबोट अंतरिक्ष यान नरम उतरा और पूरी तरह से रेजोलिथ में गायब होने के बजाय केवल कुछ सेंटीमीटर डूब गया।

निष्कर्ष

तो दोस्तों, इस लेख मे हमने बताया कि Chaand Dharti Se Kitna Door Hai? और चाँद के बारे मे अन्य रोचक जानकारियां भी साँझा की है। हम आशा करते है की आपके लिए यह लेख मददगार रहा होगा।यदि आप कोई सवाल पूछना चाहते है तो आप कमेंट बॉक्स में पूछ सकते है।


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